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Announcer1: This is Meter Down podcast ‘Bombay Taxi Drivers Write the City’ in conversation with Kabi.

Kabi: Welcome to the 6th episode of Meter Down podcast. Today, we hear Abdul Wahid Khan. He speaks of his coming to Bombay, his faith in Khuda (ख़ुदा), his son’s struggles with this year’

s cross board exams and he tells some great stories about how he has gotten cheated. My name is Kabi and I am an ex taxi driver.

Kabi: तो आपका शुभ नाम क्या है

?

Abdul Wahid Khan: मेरा नाम अब्दुल वहीद खान

Kabi: और आप कहाँ का रहने वाला

?

Abdul Wahid Khan: मैं रहने वाला यू पी का।

Kabi: वो कौन सा गाँव में यू पी में।

Abdul Wahid Khan: यू पी में बापना नमइगाना पउली।

Kabi: आप कब आया बॉम्बे में

?

Abdul Wahid Khan: हम बम्बई में तो 70 में आया। पहले हमने 10 साल मैंने होटल में काम किया। बाद में हम 82 में हम लाइन के अंदर आया।

Kabi: ये होटल का लाइन छोड़ के टैक्सी चलाने क्यों आया

?

Abdul Wahid Khan: क्योंकि होटल में उस में पगार नहीं था। होटल में उसमें महीने का 60 रुपया महीना हमारा पगार था।

Kabi: और खाना-पीना

?

Abdul Wahid Khan: खाना-पीना था होटल में। रहना

Kabi: रहना-सोना।

Abdul Wahid Khan: रहना होटल में।

Kabi: हाँ।

Abdul Wahid Khan: उसके बाद फिर हम टैक्सी में आया। इसी मजबूरी में। वो उधर कोई फ़ायदा नहीं था ना, होटल में कर के। क्यों हम तो पढ़ा-लिखा आदमी नहीं है। जो हमने बचपन में हमारा बाप गुजर गया तो हमने कुछ पढ़ाई-लिखाई नहीं कर सका। तो हम होटल – तो हम डायरेक्ट बॉम्बे में आ के होटल में काम करना सुरु किया क्यों होटल में काम करने में कुछ मुस्किल नहीं था जी। बड़े आसानी से काम मिलता था। लेकिन क्या – पगार नहीं था।

Kabi: कितना उमर था जब आया बॉम्बे में

?

Abdul Wahid Khan: हम आया जब यहाँ, रहा होऊँगा सत्तरह साल हमारा उमर था। सत्तरह।

Kabi: आप अकेला आया

?

Abdul Wahid Khan: हाँ, अकेला आया।

Kabi: आपका कोई जान-पहचान था यहाँ

?

Abdul Wahid Khan: नहीं हमारा जान-पहचान नहीं था।

Kabi: तो जब आप आया यू पी से, आप क्या ले के आया

?

Abdul Wahid Khan: बस, कपड़े थैली ले के आया, कपड़ा थैली बिस्तर ले कर के आया।

Kabi: वो यू पी में कौन था उस टाइम पे

?

Abdul Wahid Khan: यू पी में हमारा सब – हमारा तो माँ था, भाई लोग था, सब था यू पी में। वो क्या है अपना सिर्फ खेती का कारोबार था। खेती के कारोबार में क्या है

Kabi: कितना XX बीधा जमीन आपका

?

Abdul Wahid Khan: हमारे पास तो तीन एकड़ जमीन हमारे पास है।

Kabi: एकड़ में दो बीघा

?

Abdul Wahid Khan: एक एकड़ में दो बीघा होता है।

Kabi: हाँ, तो आपका छः बीघा जमीन था।

Abdul Wahid Khan: छः एकड़ था। उसमें हम लोग चार भाई लोग था।

Kabi: सब करता।

Abdul Wahid Khan: हाँ। साथ में थे लोग – सब लोग साथ में था। बाद में हम लोग अलग हो गया, 87 के बाद।

Kabi: तो आपका भाई वहाँ है अभी

?

Abdul Wahid Khan: हाँ, अभी हमारा भाई गाँव में है।

Kabi: और आप अकेला है यहाँ

?

Abdul Wahid Khan: यहाँ हमारे एक भाई और भी हैं यहाँ पे। वो अलग रहते हैं, अपना काम करते हैं।

Kabi: वो टैक्सी का लाइन में ही हैं

?

Abdul Wahid Khan: नहीं, नहीं। ये टैक्सी लाइन में नहीं हैं। और आज के दिन में देखा जाये तो टैक्सी लाइन में कुछ है भी नहीं। जभी हम वो लाइन में – टैक्सी में आया था, तो अच्छा था। उस समय हमको आराम से रोज़ का 70-80 रुपये बचता था। और बहुत आराम था उस समय सब सस्ता था। चाय वगैरह – 30 पैसे का चाय था उस समय। 25 पैसे का सोड़ा था। कोको कोला वगैरह सब 60-50 पैसे का था, 50-60 पैसे का। उस समय चीज़ सस्ता था पगार भले ही कम था लेकिन आराम सुकून बहुत था। लोगों का इन्सानियत बहुत, बहुत था उस जमाने में। आज का तो इन आदमी की इन्सानियत भी नहीं है। जैसे इंसान को रहना चहिये, आज कोई इंसानियत भी नहीं है। एक का कोई आज मदद भी नहीं करता है। उस जमाने में तो हम लोग मदद भी करता था फिर भी। कोई एक परेसान दिखेगा, उसको आदमी थोड़ा-बहुत पूछता भी था अब क्या तकलीफ़ नहीं, क्या है? आज तो आदमी वो भी नहीं पूछने को तैयार है।

Kabi: इंसान क्यों इतना चेन्ज बदली गई

?

Abdul Wahid Khan: जी। वही तो समझ में नहीं आया अभी हम पहला जमाने में – पहला हम गाँव जाते थे, गाँव से आने का टाइम में जब हम गाँव से आते थे बॉम्बे के लिये, तो कम से कम 40-50 लोग आता था हमको गाँव से यहाँ छोड़ा था, आता था गाँव से XX बाहर। ये लोग बॉम्बे जा रहा है बेचारा, या तो भी कभी आयेंगा, मालूम नहीं। अभी तो हम रोज जा के अगर हम बॉम्बे जैसे गाँव जायेंगे, गाँव से बॉम्बे में आयेंगे तो कोई, कोई पूछता नहीं है।

Kabi: हाँ। पर ऐसा क्यों हो गया

?

Abdul Wahid Khan: क्यों – इंसान का बहुत बदलाव हो गया है अभी। अभी

Kabi: पन क्यों बदली

?

Abdul Wahid Khan: बदली इंसान अभी तो क्या है, अभी तो लोग इन बदली क्यों हो गया, के आज एक-दूसरे की इज्जत नहीं कर रहा है। छोटे का इज्जत नहीं कर रहा है, माँ-बाप का इज्जत नहीं कर रहा है। आज ये तकलीफ़ से ये पूरा इंसान का इंसानियत निकल चुका है। आज इंसान अपनी जगह पे इंसान नहीं, ऐसा रहता है जानवर रहता है। उस सा आज इंसान हो गया। आज के जमाना देख के बहुत दुःख का बात है जी। कितना तकलीफ़ है आदमी को आज। आज बॉम्बे के अंदर किसी को सुख और चैन नहीं है अभी ये। कोई कितना भी कमाता होयेगा।

Kabi: आप कहाँ रहते हैं बॉम्बे में

?

Abdul Wahid Khan: मैं बॉम्बे में कोलाबा रहता हूँ। मूर्ति नगर।

Kabi: मूर्ति नगर। ये आपका टैक्सी है

?

Abdul Wahid Khan: हाँ। ये टैक्सी हमारा है ये एक।

Kabi: ये कब लाया ये टैक्सी

?

Abdul Wahid Khan: ये टैक्सी लाया 95 में। और अभी तो अक्खा दिन देखो ऐसा धन्धा करेंगा तो आजकल मार्केट में धन्धा भी नहीं है। आजकल तो सब बड़ा-बड़ा कंपनी आ कर के गरीब लोग का रोटी को छीन रहा है। आज तो

Kabi: हाँ वो ये प्रायवेट

Abdul Wahid Khan: हाँ। ये जो आज प्रायवेट ऐसी चल रहा है उनका कोई परमिट नहीं, कुछ नहीं है। वो भी रोड पे धन्धा कर रहा है। हमारे समझ से तो हमने तो इसके अंदर 30 साल निकाल दिया ये लाइन के अंदर। XX हमारी समझ में कोई फ़ायदा नहीं आया। इसके अंदर क्या है – इतना मेहनत कर के, 12-14-16-18 घंटा मेहनत कर के सिर्फ़ जी-खा सकता है समझो, मुस्किल से वो भी। आज XX गाड़ी ले के निकलो, आदमी क्या है, जो चलता – जो उसको कुछ तकलीफ़ नहीं होगी, ये गाली दे के जाता है। अब ये पहला जैसा नहीं के लो, ठीक है। हर आदमी मजबूरी में करता है। कोई भी आदमी जो कोई नौकरी करता है, कोई कुछ भी करता है, कोई सर्विस करता है। तो आदमी को क्या मजबूरी के लिये करता है। और तो हर इंसान सोचता है मैं अपना आराम से रहूँ, आराम से कमाऊँ। माने, और हर आदमी मतलब कोसिस करता है कि मेरे को ये पास ये हो जाये, मेरे पास वो हो जावे। लेकिन ये क्या है जो होने वाली बात है, ये कुदरत ने लिखा है। ख़ुदा ने लिखा है, जो ख़ुदा चाहेगा, वो होगा, उसका रोजी तो जिन्दा होने, दुनिया में माँ के पेट से पैदा होने के बाद – ख़ुदा ने उसको रोजी को लिख दिया है कि इतना मिलेगी, लेकिन इंसान को बस नहीं है।

Kabi: 30 साल हो गया आप बॉम्बे में हो? और टैक्सी का लाइन में बहुत चेन्ज हो गया।

Abdul Wahid Khan: मतलब, अभी बिल्कुल XX टैक्सी लाइन में अभी कुछ नहीं रह गया।

Kabi: नहीं रह गया। तो अब आप क्या करेगा

?

Abdul Wahid Khan: अब भी वही सहारा है कि अभी इसमें हम कैसा भी कर जिन्दगी पार करेंगा, थोड़ा दिन निकालेंगा, हमारा बच्चा पढ़ रहा है अभी ये। एक बच्चा अभी 12 में है, और एक 9 में है।

Kabi: 12th में है। तो इसी साल के उसके इग्ज़ाम हैं।

Abdul Wahid Khan: हाँ जी।

Kabi: चिन्ता नहीं है घर पे कि इग्ज़ाम का अच्छा मार्क्स होना

?

Abdul Wahid Khan: हाँ जी। बहुत चिन्ता है उसकी। बहुत चिन्ता है। और लड़का भी बहुत मेहनत करता है जी। अभी वो भी हमारी फ़िकर को जानता है कि हमको क्या फ़िकर चहिये। लड़का इतना फ़िकरमंद है – क्या – वो ट्यूशन अभी पैसे का थोड़ा प्रॉब्लम चल रहा है तो वो ट्यूसन नहीं ले रहा है वो, वो ख़ूब अपना दो – ख़ूब मेहनत से पढ़ाई ख़ुद कर रहा है अपने हाथों से।

Kabi: कितना घंटा रोज पढ़ाई करते हैं

?

Abdul Wahid Khan: रोज डेली वो कॉलेज जो है, जाता है, 2 बजे से वो डेली कॉलेज डेली जाता है वो। 2 बजे जाता है, साम को 5 बजे वापस आता है वहाँ से। उसके बाद एक घंटा जा के नमाज़ पढ़ के खाता है, फिर उसके बाद पढ़ाई रात को 9-10 तक पढ़ता है। पढ़ाई के लिये मेहनत बहुत करता है। क्योंकि हम ट्यूसन के लिये दो-तीन जगह में पूछा, तो कोई बोला कि महीने का 3500 रुपया होयेगा, कोई बोला 4000 रुपया होयेगा, तो इतना हमारा कैपिसिटी नहीं है। इसके लिये जो है हमारा बेटा बोला, आप फ़िकर मत करो, जभी – अभी तो हम ऐसा पढ़ रहे हैं, मेहनत कर के और अगर कुछ – थोड़ा कुछ कमी रहेगी, तो देखेंगे अगर – लास्ट में जो है, एक दो महीने के लिये ट्यूसन लगा देंगे। मेरा बच्चा बोला XX ट्यूसन मुझे लगा देना। अभी हमारा – मेहनत से हम पढ़ के हम कोसिस करेंगे हम ज्यादा मार्क्स लाने के लिये। मैडम, हमारे जो कुछ कमजोरी, हमारे ये कमजोरी से हम लोगों को बहुत तकलीफ़ है। मतलब हमारे कमाई कम होने की वजह से। वरना वो लोग पढ़ाई के बारे में बहुत मेहनत करते हैं वो लोग।

Kabi: तो आप बिल्कुल स्कूल नहीं गये? पहले क्लास में भी।

Abdul Wahid Khan: नहीं जी, हम नहीं, बचपन में गया। हमारा धरम का पढ़ाई पढ़ाई पढ़ा हमने, 3-4 साल पढ़ा। एकदम बचपन में पढ़ा हमने। और फिर हम बॉम्बे में तो हम आया, हम बताया ना इधर बॉम्बे में जब आया मैं, 17 साल का हमारा उमर था। उससे पहले हम 4 साल बाहर भी काम किया, यू पी में ही। वो पानी विनी देने का ऑफ़िस में साब लोग को, वो ही हमने काम किया पहला। 4 साल तक किया। समझो हमारा उमर जो है 12 साल का था जब से मैं समझो काम कर रहा हूँ।

Kabi: तो आप रात में दूसरा ड्रायवर को देते टैक्सी

?

Abdul Wahid Khan: हाँ ये दूसरे – रात को दूसरे – देता हूँ दूसरे को।

Kabi: और भाड़ा कितना देता है आपको।

Abdul Wahid Khan: वो सौ देता है, कभी सवा सौ देता है, कभी डेढ़ सौ देता है। उसमें भी क्या काम निकल जाता है। और हम बीच में ये टैक्सी दूसरे को दे के XX चलाया, इधर-उधर से हमको दो सौ रोज मिलता था, तो हम दूसरे को दे के चलाते टैक्सी को। हमने – नौकरी हम करते थे। तो हम

Kabi: आप कौन सा नौकरी

?

Abdul Wahid Khan: ये प्रायवेट नौकरी करा था, प्रायवेट गाड़ी का। तो उसमें हमको पाँच हजार पगार था महीने का। वहाँ हम करता था। हमको अच्छा बहुत था। तो आया देखा मैंने ड्रायवर ने गाड़ी छोड़ दिया तो फिर मैं गाँव गया था। तो अभी आया तो ड्रायवर ने गाड़ी छोड़ दिया, गाड़ी खड़ा हो गया था। अभी उसमें भी बहुत लॉस हो गया क्योंकि हमने इस पे थोड़ा सा हमने लोन भी ले के रखा है।

Kabi: किस – कहाँ से लोन मिले

?

Abdul Wahid Khan: ये हमने प्रायवेट लोन लिया, दादर में

.

Kabi: कितना टका

?

Abdul Wahid Khan: हमने उधर 12 टका पे लोन लिया।

Kabi: 12 टका

?

Abdul Wahid Khan: हाँ।

Kabi: और बैंक से वो लोन नहीं मिलते

?

Abdul Wahid Khan: ये जूना गाड़ी को बैंक लोन नहीं देता है।

Kabi: अच्छा। अपना जूना गाड़ी लिया था

?

Abdul Wahid Khan: हाँ। जूना। यही गाड़ी है जी। इस पे ही लोन लिया था मैंने, इसी गाड़ी के ऊपर। क्यों हमको कि थोड़ा पैसे का काम आ गया था मेरे XX लोन ले XX। क्योंकि बैंक जो है नया गाड़ी पे लोन देता है। और आज तो इतना नया गाड़ी है के उतना तो हम कमा नहीं सकता है, तो हम गाड़ी ले के भी क्या कर सकता है उसको? आज का जो गाड़ी है छः लाख, सात लाख का।

Kabi: हाँ, वही प्रॉब्लम है। ये नया गाड़ी डालते हैं तो इसका महीने का महीने का वो जो पैसा देना पड़ता है बैंक को वो ये पूरा नहीं होता

?

Abdul Wahid Khan: नहीं। वो रोज डेली का हिसाब से हमको कम से कम तीन सौ रोज देना पड़ेगा। 9,000-10,000 महीने देना पड़ेगा।

Kabi: हाँ। इतना कौन कमा के

Abdul Wahid Khan: तो हम इतना हम कमा ही नहीं सकता तो देगा कहाँ से

?

Kabi: तो शादी बम्बई में किया के यू पी

?

Abdul Wahid Khan: नहीं, सादी जो है गाँव में किया।

Kabi: आपकी बीबी यहीं रहती है कि

?

Abdul Wahid Khan: नहीं, यहीं रहती हैं साथ में ही।

Kabi: यहीं रहती है साथ में। तो कोलाबा में रहते है।

Abdul Wahid Khan: हाँ जी।

Kabi: एक रूम में

?

Abdul Wahid Khan: एक रूम लिये केवल।

Kabi: भाड़ा से ही रहते हैं कि आप

Abdul Wahid Khan: नहीं जी, हमारा तो अभी तो रूम भाड़े से था। अभी मुझे ले कर के अभी समझो – ले के 5 महीना भी हो गया।

Kabi: अच्छा। खरीद लिया

?

Abdul Wahid Khan: अभी खरीद के लिये। रूम लिया है, साब, झोपड़े में लिया। कोई बिल्डिंग में नहीं लिया।

Kabi: हाँ।

Abdul Wahid Khan: हाँ जी।

Kabi: पर मतलब कितना में लिया

?

Abdul Wahid Khan: हमने लिया दो लाख साठ हजार में।

Kabi: आप बुरा नहीं मानें कि मैंने पूछा आपसे कि कितने में लिया

?

Abdul Wahid Khan: नहीं, नहीं। दो लाख साठ हजार में लिया। वही, बुरा नहीं मानने की कोई बात नहीं जी। हम सच बात बता रहे हैं आपको।

Kabi: अच्छा है। तो आपका ख़ुद का घर है।

Abdul Wahid Khan: हाँ। अभी घर हो गया जी ख़ुद का अभी। वो भी इसलिये कि गाड़ी – बताया ना कि गाड़ी पे लोन लिया ना, उसलिये लोन मिली है, पैसा कम पड़ रहा था तो मैंने गाड़ी पे लोन ले लिया था। अस्सी हजार रुपये का लोन लिया था गाड़ी पे, जिसको महीने का इसको 3,000, 3,000 देना पड़ता है।

Kabi: 3,000 देना पड़ता लोन का

?

Abdul Wahid Khan: हाँ जी।

Kabi: 3,000 देना पड़ता है तो कम से – आप कम से कम 300-500 रुपये रोज कमाते हैं? सी एन जी के बाद

?

Abdul Wahid Khan: नहीं जी। हम तो उतना नहीं कमा पाते। हमारा तो 200-300, 200-300 हम कमाते हैं जी। उसमें हमारा गाड़ी का मेण्टीनेन्स भी करना पड़ता है।

Kabi: हाँ, हाँ। तो आप 200-300 कमाते और रात की ड्रायवर डेढ सौ

Abdul Wahid Khan: हाँ। वही सौ, डेढ सौ देता है।

Kabi: तो रात की ड्रायवर सौ रुपये देता रोज। तीस दिन का, तो वही है इसका

Abdul Wahid Khan: वो उसको दे देता है जी। हमारे कमा कर के हमारे घर का पूरा खर्चा पूरा हो XX

Kabi: हाँ। ये ठीक है। इतनी साल में टैक्सी चलाते है तो आपका कुछ पैसेंजर के कुछ कहानी है के

Abdul Wahid Khan: हमने – एक बार हमारे साथ हुआ इधर ही दादर में। दादर फूल मार्केट के पास। वहाँ पे लोग ऐसा — गणपति का टाइम था। वो लोग रोड पे डेक लोग लगा के रखे थे। नाच-गा रहे थे डेक लगा के। मूर्ति के सामने। और हम हमारी गाड़ी काम में थी तो हमने पूरा पतरे का काम करा के पेण्टर के पास – जो गाड़ी पेण्टिंग करता है। हम वहाँ ले के जा रहे थे।

Kabi: कहाँ पर।

Abdul Wahid Khan: इधर। दादर। जो हम ले के जा रहे थे। तो उधर 4-5 लड़के लोग दौड़ के आया और मुझे पकड़ लिया। पकड़ लिया तो बोलता है तूने वो लड़के को उड़ा दिया। तो मैं बोला भई, हमारे तो गाड़ी से कोई उड़ा नहीं, कुछ नहीं। अब आप जबरदस्ती XX क्यों कर रहे हो? उस समय हम भी बहुत — ऐसा — उसमें हिट हो जाये ऐसा मैं XX महीना था, रोज़े का महीना था। तो हम रोज़े से थे। गला सब सूखा हुआ था। तो वो लोग जबरदस्ती बोले, नहीं-नहीं, चलो, इसको ले के चलो। तो इसको मैं – उसको बैठा लिया मैंने। उस वक़्त मेरी गाड़ी में सीट भी बराबर नहीं था। मैं खाली ऐसा टूल पे बैठ के गाड़ी ले के जा रहा था गैरेज में। तो वो लोग बोलता है कि तूने मेरे बच्चे को उड़ा दिया। मैं बोला, भाई, नहीं, हमने कुछ उड़ाया नहीं, हमारा लगा भी नहीं। तो मैं बोला, भई चलो, सुबह-सुबह गाड़ी ले के जा रहा था, जा रहा था के एम अस्पताल की तरफ़। XX के एम।

Kabi: हाँ। के एम हॉस्पिटल। हाँ।

Abdul Wahid Khan: तो वो बोला, नहीं-नहीं, हमको के एम में नहीं जाना है। मैं बोला भई अभी तुमको मार लगा, तो के एम में जाना पड़ेगा ना। नहीं-नहीं-नहीं-नहीं, के एम में नहीं जायेगा। और इसको ले लो, लाल बाग। क्यों भई, लाल बाग ले लूँ? मैं बोला, तुमको मार लगा हुआ है। बोलता, नहीं-नहीं, मस्तावे, नहीं हमको खाली मालिस वाले के पास जाने का है, जो मालिस करता है ना, पैर को जा टूट गया, फूट गया, बैठाता है। हमको उसके पास जाने का है। तो मैं उसके पास उसको ले के गया। तो वो ले लिया उधर। वो बोला के 400 रुपये का खर्चा आयेगा। हालांकि वो मालूम पड़ा कि वो लोग घर में कभी ना कोई कहीं भी गिर-विर के उन लोगों का पैर में थोड़ा मोच आ गया था। तो और बाद में 400 रुपये हमसे जबरदस्ती वसूल किया उसने। हमारी गाड़ी से लगा भी नहीं, फिर भी हमसे वसूल किया उसने। हमारा मजबूरी हो गया XX। और वो लोग क्या 10-15 लोग आ गया। फिर मजबूरी में ऐसा हो गया और ऐसा तो पहले साथ बहुत बार हुआ। ऐसे तो एक बार क्या हुआ, एक टैक्सी में बैठा मेरे, सायन में। वो बोला यहाँ से लेफ़्ट उसने एक बिल्डिंग में ले लिया। सर्कल के बाजू में बिल्डिंग था। बोला कि बिल्डिंग में गाड़ी ले लो, बोला उसने। मैंने गाड़ी बिल्डिंग में ले लिया। तो उसने ऐसा छुरी उठा के कार्टून मेरा रखा, 3-4 कार्टून, मेरे डिक्की में ला के रखा उसने मेरे। तो वो क्या बोल रहा है। क्या — हमको जाना है उधर बम्बई सेण्ट्रल, एस टी जाना है। मैं बोला कोई बाद नहीं। तो ऊपर एक आवाज़ दे रहा है तीन माले से, के अरे भई, ये ड्रायवर से चेन्ज ले कर के आना। तो मेरे से बोलता है भाई साहब वो हमारा साब चेन्ज माँग रहा है। भई, क्यों भई, हम चेन्ज दूँ आपको? पहला पैसा दिया तब चेन्ज दूँगा ना आपको। ऐसे चेन्ज मैं कैसे दूँगा आपको? फिर वो बोलता है, नहीं, साब वो हम लोगों को बख्सीस देगा। बोला, कोई बात नहीं, वो – तुम जा के उधर नोट लाओ, फिर मैं तुमको देता हूँ चेन्ज, मेरे पास है। लेकिन ऐसा चेन्ज नहीं किसी को देता नहीं। उतने में वो ऊपर लाने के लिये गया। पैसा, रुपया लाने के लिये गया। तो वो गायब हो गया। हमने – मैं गाड़ी सामान रखा है उसने, सोचा मैंने। तो उसके लिये मैंने कम से कम नहीं तो मैंने उधर आधा घण्टा उसके लिये वेट किया। नहीं आया। नहीं आया तो सबसे पूछ बाबा, ये सामान किसका है, क्या है। XX मैं क्या करूँ? मेरा गाड़ी खड़ा करने का टाइम हो रहा था, साम को छः बज रहा था। तो, वो बोला ठीक है। वो फिर, बाजू वाला बोला, बोला, चले जाओ, बोला। मैं बोला, भई ये सामान? बोला, सामान XX किसी ने देखा खोल के, तो उसमें क्या सब पत्थर निकला, किसी में दो पत्थर, किसी में चार पत्थर, ऐसा पत्थर निकला। तो बाद में सामान भी फेंक के, सब उधर नीचे रख दिया, फिर मैं चला गया वहाँ से मैं।

Kabi: अच्छा। मैं एक बात और पूछूँ आपसे? आपकी क्या ख्वाहिश है

?

Abdul Wahid Khan: अभी तो ये अपना कुछ ख्वाहिश नहीं है। अभी हमारी एक ख्वाहिश है कि हम तो नमाज पढ़ते हैं, हमको पाँच टाइम की नमाज मिले और जो छोटा मोटा मिले अभी वो हमको कुछ – कोई चीज का ख्वाहिश अभी नहीं है जी। हमको कुछ – हमने ये – हमारा इतना उमर चला गया, हमने अभी तक हमने हमको पिक्चर के बारे में मालूम नहीं है। मतलब खाली अमिताभ ऐसा दो-चार हीरो का नाम जानता हूँ, लोगों को चेहरे से पहचानता हूँ, उन लोगों के बंगले तक कभी भाड़ा ले के गया है बहुत बार। बाकी हमारा कुछ ऐसा – कभी हमारा कुछ दिल नहीं हुआ कि हम ऐसा-वैसा कुछ नहीं। हमारा दिल बहुत सादिक दिल था, कि इंसान की जिंदगी बहुत छोटा सा जिंदगी है। इंसान सोचे जिंदगी कुछ ज्यादा कुछ नहीं है। और इंसान कभी भी खतम हो सकता है। और हमारे धरम के अंदर क्या है कि जो आदमी कलमा पढ़ते-पढ़ते गुजर जायेगा, उसको ख़ुदा जन्नत देगा। और हमें और कुछ ख्वाहिश अभी नहीं है जी। न हमको कुछ बंगला बाँधना है, न बिल्डिंग बाँधना है। हम तो ये सोचते हैं ख़ुदा अपने बच्चों को रोजी-वोजी लगा देवे और अपना जिंदगी ऐसे ही कट जाये। और वो क्या है, इंसान आज का तो कोई सौ साल नहीं जीता है, कोई 70 साल, कोई 60 साल, ना। उसके बाद अगर जिया तो समझ लो कि वो अभी तकलीफ़ ही में जिये बेचारा, उसको अगर कुछ बच्चे लोग आजकल, क्या है, किसी को XX किसी देखभाल नहीं कर पाते, क्योंकि बच्चे उस जो अगर बच्चे के बच्चे बढेंगे तो वो अपने बच्चों पे ध्यान करता, अपने माँ-बाप – हालांकि माँ-बाप भी बच्चे ही बराबर हैं। जो जिसने किया अभी हम लोगों ने अपने – हमने तो अपने — हमारे बाप तो हमारे सामने नहीं थे, हम तो दो साल के थे जब XX हमारे बाप इंतकाल कर – गुजर गये हमारे बाप और हमने तो अपनी माँ की बहुत सेवा की। हमारी माँ से बिगैर पूछे हम कहीं गया नहीं कभी। और हमारे — बिगैर भाई लोग से पूछे, हमने कोई काम नहीं कभी किया। हमने तो उन लोगों को – हमेसा – और किसी का हमने कुछ लिया-दिया नहीं कभी और हम बहुत – हमको कोई तकलीफ़ नहीं है। लेकिन थोड़ा अभी मैं ये लोन ले लिया, थोड़ा हमें तकलीफ़ है जी। और कोई बात नहीं है। मैं बहुत ख़ुशहाल हूँ।

Kabi: आपका हज जाने का ख्वाहिश

?

Abdul Wahid Khan: नहीं जी, अभी हम वो जी हमारा हज का मसला ऐसा है कि जिसके पास पैसा हो हज के लिये वो जा सकता है। वरना अगर पैसा नहीं तो कोई बात नहीं। इसलिये हमारे ख़ुदा ने इसको जो रखा है इसके ऊपर ना, माल के – जैसे कहते कि वो जकात देवे किसी ग़रीब को, तो मालदार को देना चाहिये, जिसके पास पैसा हो। या हज के लिये जिसके पास पैसा हो उसको जाना चहिये। ख्वाहिश तो बहुत है जी जाने का, लेकिन हमारे पास पैसा नहीं है तो हम कैसा जा सकता है? और क्या मालूम कभी किस्मत में होयेगा, तो जा भी सकता है।

Kabi: जा भी सकता है।

Abdul Wahid Khan: हम नहीं सोच सकते कुछ। वो तो ख़ुदा ही जान सकता है इसके बारे में। हमको कुछ भी मालूम नहीं है।

Kabi: I hope you enjoyed this episode. I loved the story about the patthar because the same thing happened to me when I drove taxi, only it was a shopping bag, stuffed with newspapers, with XX showing on the top. Please go to the blog at MeterDown.WordPress.com because he was full of stories and there were three more outtakes about cheating and another outtake about a good passenger and then other outtakes about Khuda and about changing Bombay. I hope you join me again when we write the city in conversation with another Bombay taxi driver. Till next time.


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